मुस्लिम समाज, मसावात और रेज़ालत टैक्स

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मुसलमानों को रजील और शरीफ दो वर्गो में विभाजित कर देने का कानूनी जवाज़ पैदा करने की कोशिश की गयी।

मुस्लिम समाज को हमेशा से मुस्लिम रहनुमाओं द्वारा इस तरह लोगो के सामने पेश किया जाता रहा है कि मुस्लिम नामक शब्द जब भी किसी के सामने आता है तो आम तौर पर लेगो के जेहन में एक ऐसे समाज/वर्ग/सम्प्रदाय की छवि उभरती है जो जन्म आधारित ऊंच-नीच ही नही बल्कि ज़ात-पात से भी पाक है। ऐसा महसूस होता है कि जैसे सब बराबर है बल्कि मसावात शब्द तो जैसे मुस्लिम समाज का पर्याय हो। लेकिन सत्यता ये है कि ये मुस्लिम समाज की नही बल्कि इस्लाम की विशेषता है। मुस्लिम समाज में जन्म आधारित ऊंच-नीच इस तरह मौजूद है जिसकी एक आम गैर मुस्लिम के द्वारा कल्पना कर पाना मुश्किल होगी। सत्य तो यह है कि मुस्लिम समाज मे भी लगभग वही स्थिति है जो हिन्दू समाज की है, जैसे भंगी कभी भी सार्वजनिक कुओं से पानी नही भर सकता था तथा मस्जिद में वह सबके लिये इस्तेमाल होने वाले भधने/बधनी/लोटा से वजू नही कर सकता था तथा छोटी ज़ाति के लोग नमाज़ में अशराफ के बराबर की लाइन में खड़े भी नही हो पाते थे उनकी लाइन भी पीछे लगती थी। कुछ जगहों पर तो आज भी ये परम्परा जारी है ऐसे कई उदाहरण पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर साहब ने अपनी पुस्तक “मसावात की जंग” में सुबूतों के साथ लिखे हैं।

जिस प्रकार हिन्दू समाज मे छोटी ज़ाति की महिलाओं को स्तन ढकने पर केरल में स्तन टैक्स देना पड़ता था। उसी प्रकार मुस्लिम समाज मे भी ज़ाति आधारित टैक्स तक लगाए जाते थे जैसे धोबियों से लिया जाने वाला प्रजौटी टैक्स। इसी प्रकार गोरखपुर के जमींदार पसमांदा (अजलाफ/अरज़ाल) मुसलमानों से रेज़ालत टेक्स वसूल करते थे क्योंकि उनका मानना था कि ये रज़ील (कमीना, नीच) हैं।【1】
नेयामतुल्लाह अन्सारी

जब नेयामतुल्लाह अन्सारी साहब ने इसके खिलाफ आवाज़ उठायी तब काजी/ज़मीदार साहिबान ने पहले डरा-धमका कर टैक्स वसूलने की कोशिश की मगर जब इस रास्ते से कामयाबी नही मिली तब जमीदार काजी तसद्दुक हुसैन ने गोरखपुर मुन्सिफी में मु०पाँच रुपया कुछ आने का दावा दायर किया कि नियामतुल्लाह ने कई साल से टैक्स जमा नही किया है और इनका ताल्लुक अन्सारी बिरादरी से है जो कि रजील/नीच (दलित) जाति है इसलिए अशराफ और जमीदार होने के नाते घरद्वारी कर/रेज़ालत टैक्स वसूल करने का उनको हक है और कोर्ट से अपील की कि टैक्स की अदायगी इन तमाम रजील (अजलाफ-अरजाल) वर्गो पर अनिवार्य करार दिया जाये। इस मुकदमे का न्यामतुल्लाह अन्सारी ने जमकर विरोध किया और फलस्वरूप 22 मई 1939 को काजी साहिबान का मुकदमा फाजिल मुन्सिफ ने ये कहकर ख़ारिज कर दिया कि “जोलाहे रज़ील नही है” लेकिन काजी साहिबान अपनी बरतरी/श्रेष्ठता का दावा छोड़ने को तैयार नही थे और फैसले के खिलाफ गोरखपुर सेशन कोर्ट में अपील दायर की गोरखपुर सब जज की अदालत से भी काजी साहिबान को मुँह की खानी पड़ी लेकिन काजी तसद्दुक हुसैन ने फैसले के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील कर दी। इस तरह ये ऐतिहासिक मुकदमा गोरखपुर की लोअर कोर्ट से शुरू होकर हाईकोर्ट तक पहुँच गया।

यह केस इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस उनवान से चला कि–“क्या जोलाहा रज़ील है। “काजी साहिबान ने मवाद और माखज़ इकट्ठा करके कोर्ट में बहस कराई जिसे बाद में “जोलाहनामा” के नाम से किताब की शक्ल में छपवाया गया, दूसरी तरफ नियमातुल्लाह अन्सारी की तरफ से वकीलों ने माखज़ और मवाद जमा करके जो बहस की वह “काजीनामा” के नाम से प्रकाशित हुई। इन दोनों दस्तावेजों (जोलाहनमा, कजीनामा) मे नियामतुल्लाह अन्सारी के मुकदमे जोलाहे रज़ील हैं या शरीफ” की तफसील दर्ज है।

मोमिन गजट में, जो बाबा-ए-कौम मौलाना आसिम बिहारी(र०अ०)की कयादत और हकीम बशीर अहमद जहाँगीराबादी की एडीटरशिप में मेस्टन रोड कानपुर से प्रकाशित होता था, के अलावा अन्य समाचार पत्रों में इस मुकदमे की रूदाद बराबर छपती रही। इस मुकदमे में काजी तसद्दुक हुसैन के साथ उनके साहबजादे काजी तलमंद हुसैन, जो हैदराबाद स्टेट के जिसको हम मुसलमान इस्लामी रियासत और मुसलमानों की हुकुमत की आखिरी निशानी समझते हैं, उस्मानिया यूनिवर्सिटी के अनुवाद विभाग के एक मोअजिज्ज रुक्न थे, भी पूरी तरह सरगर्म थे और जोलाहों को रज़ील साबित करने के लिए जमीन आसमान एक कर दिया। लेकिन यहाँ भी काजी साहिबान को मुँह की खानी पड़ी।

अहम पहलू
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इस केस का दूसरा घिनौना पक्ष ये है कि मुसलमानों को रजील और शरीफ दो वर्गो में विभाजित कर देने का कानूनी जवाज़ पैदा करने की कोशिश की गयी। अफ़सोस की बात ये है कि किसी भी मुस्लिम रहनुमा या इस्लामिक इमारत (बरेली, देवबन्द, नदवा, जमीयत ओलमा हिन्द, फिरंगी महली, शिया आदि) ने इस मुकदमे के खिलाफ एक भी लफ्ज़ लिखने की जहमत नही की बल्कि ये साबित करने के लिए कि “जोलाहे रज़ील है” ठेलो पर लाद-लाद कर हर फिरको (बरेलवी,देवबंदी आदि) के ओलमाओ की किताबें भेजी गयी। लेकिन अंग्रेजी अदालत ने इन इबलीसवादी【2】ओलमाओ की किताबों की इबारतों को नजर अन्दाज करके सच्ची इस्लामी शिक्षाओ के आधार पर फैसला दिया और काजी साहिबान को मुँह की खानी पड़ी। अदालत ने जोलाहो को रजील मानने से इन्कार कर दिया।

संदर्भ:-
【1】-स्वतंत्रता सेनानी नियामतउल्लाह अंसारी- एक सौ दसवां जन्म दिवस (प्रोफेसर हुमायूँ मुराद)
【2】- जन्म आधारित ऊंच-नीच का समर्थक

लेखक :- एडवोकेट नुरुल ऐन मोमिन, नुरुल ऐन मोमिन 'आल इण्डिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ ' (उत्तर प्रदेश) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और पेशे से एडवोकेट हैं.

नोट: यह लेखक के अपने निजी विचार हैं। संपादक का लेख से सहमत होना आवश्यक नहीं।

ये लेख प्रथम पसमांदा डेमोक्रेसी डॉट कॉम पर प्रकाशित हुआ था।  जिसे यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। 

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Indian Weaver Community : मुस्लिम समाज, मसावात और रेज़ालत टैक्स
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