धर्म और जाति: क्या सच क्या झूठ

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मतलब बिल्कुल साफ है कि धर्म समस्या नही बल्कि जाति समस्या है। इसीलिए जातिवाद समस्या की गम्भीरता को देखते हुए जातिवाद से त्रस्त समुदाय/समाज(बहुजन-पसमांदा) को जैसे ही मौक़ा मिला उसने इस सामाजिक बुराई के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया।

धर्म को इस देश की समस्या बनाया और बताया जाता है। जब कि सच्चाई यह है कि धर्म भारतीय समाज की सुंदरता है समस्या नही। पूरी दुनिया के किसी भी देश में इतने धर्म, सम्प्रदाय, मत, आस्थाएं एक साथ समान रूप से मान्य और स्वीकार रूप में नही पाए जाते हैं। आज भी आये दिन नए-नए मत सम्प्रदाय और आस्थाएं जन्म लेती रहती हैं। धर्म को लेकर भारतीय समाज सदैव सहिष्णु रहा है। सामान्य-जन ने सदैव अपने धर्म,मत, सम्प्रदाय,आस्था के विपरीत वाले धर्म, मत आस्था एवं सम्प्रदाय का सम्मान किया है और करते हैं, यह नज़रिया भारतीय समाज की एक बिल्कुल सामान्य सी बात है। सामान्य रूप से एक धर्म का मतावलंबी का दूसरे धर्म के मतावलंबी के धार्मिक प्रतिष्ठानों पर आना जाना, तीज त्योहारों में शामिल होना, शादी विवाह की रस्मो में हिस्सा लेना एक सामान्य प्रक्रिया रही है। धर्म को एक  राजनैतिक और शोषण के साधन के रूप में प्रयोग करना शासक वर्ग की नीति रही है। खास तौर से अशराफ(मुस्लिम) और सवर्ण, जो इस देश का शासक रहा है और है भी, ने धर्म को अपनी सत्ता स्वार्थ के हित साधन के लिए प्रयोग करता आया है। वो धर्म के नाम पर आम-जन की भावनाओ को भड़का कर उनके बीच वैमनष्य पैदा करके यहाँ तक कि दंगे फसाद को प्रायोजित कर आमजन के खून और लाश पर अपना सिंघासन/तख्त रखता आया है। अशराफ और सवर्ण के इस धर्म की राजनीति का भुगतान भारत ने तीन टुकड़ो में बट कर किया है। इनसब के बावजूद भी धर्म भारतीय समाज की खूबसूरती बना हुआ है। और सभी धर्मों,मतों,सम्प्रदायो के लोग बिना किसी प्रकार की राजनीति से प्रभावित हुए एक दूसरे से अपना तारतम्य स्थापित किये हुए है

अब बात करते हैं भारतीय समाज की मूल समस्या, जाति के बारे में, जो कालांतर से लेकर आज के सभ्य समाज तक  ज्यों की त्यों बानी हुई है। आस-पास के दैनिक अनुभवों एवं नित्य नए जातीय भेदभाव के खबरों से यह बात साबित होती है कि आज भी भारतीय समाज का एक सभ्य समाज होने का दावा केवल कोरी कल्पना मात्र ही है। इंसान धर्म बदल लेता है लेकिन जाति उसका वहाँ भी पीछा नही छोड़ती है। एक भंगी/मेहतर/स्वच्छकार हिन्दू से मुसलमान हो जाता है जहाँ उसको एक अच्छा  नाम हलालखोर( हलाल की कमाई खाने वाला) मिल जाता है लेकिन ना तो उसे उसकी जातिगत काम (साफ सफाई, मल मूत्र साफ करना, सर पर मैला ढ़ोना आदि) से छुटकारा मिलता है (हालांकि इस इस स्तिथि में कुछ सुधार भी हुआ है लेकिन मंज़िल अभी भी बहुत दूर है) नाहीं जातीय उत्पीड़न से छुटकारा  मिलता है यहाँ भी उसे नीच ही समझा और व्यवहार किया जाता है उनको अपने अल्लाह को याद करने के लिए अलग मस्जिद तक बनानी पड़ जाती है और अशराफ के मस्जिदों में अगर जगह भी मिलती है तो पिछले सफ़(सला/नमाज़/ प्रार्थना की लाइन) में ही। मरने के बाद भी जाति उसका पीछा नही छोड़ती और दफ़न होने के लिए भी अशराफ(मुसलमान) का क़बरस्तान मयस्सर नही होता और इधर उधर ही दफन हो पाता है। लगभग यही हाल सिख और ईसाई धर्मो में जाने के बाद भी होता है। उसका नाम “चंदन” से “फ़ैयाज़” या “सिल्वेस्टर” या “गुरिन्दर” हो जाता है और कभी कभी तो ये भी नसीब नही होता है और वो “घुरऊ” से “झमेली” या “फेकन” ही रह जाता है। लेकिन उसकी समस्या खत्म नही होती और ज्यों कि त्यों बनी रहती है।

तारिक़ गुज्जर ने ठीक ही लिखा है…

कितने गौतम आये
तो कितने भगत कबीर
कितने नानक देख लिए
तो कितने मियाँ मीर 
कितने कलिमे पढ़ लिए
लिए कितने मज़हब बदल
कैसे-कैसे रक्त
ली ति रंगा अपनी जा
चारो मौसम हमारी घात में हमारी ही टोह में हर रुत
हमने ईसा के घर पनाह ली
पर, फिर भी रहें कपूत
हम शुद्र दलित हरिजन
हम केवट* भंगी* भील*
यह जग तमाशा झूठ सा
हम सच सझकर गये खेल 
हमारा अम्बर से भाई-पट्टीदारी का झगड़ा
हमारी ही सौतन, यार, ज़मीन
हम इसी के बीच हैं भटकते
हम कमी* यार कमीन*

(कविता मूल पंजाबी से हिंदी में मुहम्मद इरफान उर्फी द्वारा अनुवादित है) 

* पसमांदा-बहुजन जातियों के नाम 

मतलब बिल्कुल साफ है कि धर्म समस्या नही बल्कि जाति समस्या है। इसीलिए जातिवाद समस्या की गम्भीरता को देखते हुए जातिवाद से त्रस्त समुदाय/समाज(बहुजन-पसमांदा) को जैसे ही मौक़ा मिला उसने इस सामाजिक बुराई के विरुद्ध बिगुल फूंक दिया। जिसमें बहुत से लोगो ने अपने जान माल और समय की महती क़ुरबानी देकर जातिवाद की कमर तोड़ दिया। जिसमें कबीर, नानक, ज्योतिबा फुले (1827-1890), भीमराव अम्बेडकर (1891-1956) और आसिम बिहारी (1890-1953) के नाम प्रमुख हैं। वंचित जातियों का धर्मपरिवर्तन जातिवाद के विरुद्ध लड़े जा रही लड़ाई का हिस्सा था, उसने अत्याचारी शासक के धर्म को छोड़कर उसके विरुद्ध अपनेे विरोध और प्रतिरोध को मज़बूती प्रदान करते हुए जाति उन्मूलन की लड़ाई को आगे बढ़ाया। इस प्रक्रिया में कुछ ने तो पूरा का पूरा धर्म ही बदल लिया, कुछ ने धर्म बदलने के साथ-साथ अपनी संभ्यता संस्कृति को बचाये रखा और कुछ ने अपने पुराने धर्म मे रहते हुए नय धर्म के सभ्यता संस्कृति को अपना लिया। लेकिन आज भी सच्चाई यही है कि जाति व्यवस्था से उत्पीड़ित लोगो नें जातीय उत्पीड़न से छुटकारा हासिल करने के लिए धर्म परिवर्तन कर सभी धर्मों को अपनाया लेकिन किसी भी धर्म ने इनको नहीं  अपनाया। 

ऐसा देखने में आता है कि अभी तक पूरी तरह इस भारतीय समाज की सबसे गम्भीर और बुरी समस्या का पूर्ण निराकरण नही हो पाया है और जाति उन्मूलन का लक्ष्य पूर्ण रूपेण हासिल नही हो पाया है। लेकिन एक बड़ी अजीब विड़म्बना है कि जाति उन्मूलन पर बात न करके  धर्म को सबसे बड़ी समस्या बताकर आमजन को इसी में उलझाया रखा जा रहा है। जब तक जाति उन्मूलन का लक्ष्य पूरी तरह से प्राप्त नही कर लिया जाता तब तक भारतीय समाज रोगी ही रहेगा, क्यों कि जिस तरह से शरीर के किसी भी अंग में यदि कोई बीमारी है तो पूरा शरीर ही बीमार/अस्वस्थ समझा जाता है जब तक कि उसका उचित इलाज द्वारा उसे स्वस्थ ना कर लिया जाए। ठीक उसी प्रकार जब तक जातिवाद को पूर्णतः समाप्त नही किया जाएगा भारतीय समाज रोगग्रस्त ही माना जायेगा। 

त्रैमासिक पत्रिका पसमांदा पहल से साभार

ये लेख प्रथम पसमांदा डेमोक्रेसी डॉट कॉम पर प्रकाशित हुआ था।  जिसे यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। 

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धर्म और जाति: क्या सच क्या झूठ
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